अगर आप शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हैं तो आज कल अपने आप को बदलने का काफी दबाव झेल रहे होंगे. जैसे गब्बर सिंह के आने का डर था, वैसे ही आर टी ई (शिक्षा का अधिकार कानून) का भी खौफ फ़ैल रहा है!
लेकिन अपने आप को बदलने के कारण तो वास्तव में कुछ और हैं. जो बदलाव चाहे गए हैं, वे वही हैं जिन से हम भी सहमत होंगे - जैसे बच्चों की ज़रूरतों को महत्व देना, अपने काम को प्रभावशाली तरीके से करना, बिने शारीरिक व मानसिक हिंसा के.
इसी लिए अपने आप को बदलने के कारण कुछ इस प्रकार हैं -
१. नए तरीकों से पढ़ाने में मज़ा आता है, बोझ कम हो जाता है, और कम काम/उर्जा से अधिक परिणाम मिलता है. (आपको विश्वास नहीं होता तो कमेन्ट डालिए, मैं विस्तार से लिखूंगा)
२. हम व्यवसायिक लोग हैं, एक मानक के हिसाब से अच्छा काम करके पैसा लेते हैं.
३. हमारा हक है कि हम अपने व्यवसायिक जीवन का आनंद लें!
ये तो थी आसान बात. लेकिन असली सवाल है कि बदलें क्या? और किस तरह से? इन पर पहले आप के सुझाव हो जाएँ, फिर मैं अपनी ओर से लिखूंगा.
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Saturday, 16 October 2010
Tuesday, 12 October 2010
कैसे रिसोर्स पर्सन नहीं बनें
जब भी शिक्षा में दिशा तय करने की कोशिश होती है तो दो अलग तरह के स्रोतों पर जोर होता है. पहला तो है, शिक्षा के पितामाह किस्म के सीनियर लोग, जो कि आस्था चैनेल की तरह लम्बे-लम्बे प्रवचन देतें हैं और माना जाता है कि हम नादान लोगों को इससे प्रेरणा व दिशा मिलती है. आजकल इनके कुछ छोटे भाई भी हो गए हैं, जिन्हें हम मठादीश की उपाधि देंगे -- ये किसी एक विचारधारा के समर्थक होते हैं और मानते हैं कि जो भी इनके दायरे में नहीं आता, वह तो बात करने लायक भी नहीं है. कुल मिला कर ये दोनों तरह के लोग भक्तों की तलाश में रहते हैं. कहीं ना कहीं यह धारणा भी रहती है कि ये सच में बहुत कुछ जानते हैं और बाकी लोग दिमाग से कमज़ोर हैं.
दूसरा स्रोत है - आंकड़े-धारी लोग. इनके पास तरह-तरह की जानकारी होती है - बच्चों, शिक्षकों, स्कूलों, आदि के बारे में. इनकी नज़र में प्लैनिंग व क्रियान्वयन के मुख्य ध्येय है व्यवस्था को सही आकड़ों तक पहुँचाना. इनकी दृष्टि में भी आम आदमी व उसके कार्य मात्र एक माध्यम हैं - वही सही आकड़ों तक पहुँचने में.
आगे तो आप समझ ही गए होंगे कि हमें कम से कम इस तरह के रिसोर्स पर्सन तो नहीं ही बनना चाहिए. तो फिर किस तरह का रिसोर्स पर्सन बनना चाहिए ? इसके बारे में लिखेंगे अगली बार!
दूसरा स्रोत है - आंकड़े-धारी लोग. इनके पास तरह-तरह की जानकारी होती है - बच्चों, शिक्षकों, स्कूलों, आदि के बारे में. इनकी नज़र में प्लैनिंग व क्रियान्वयन के मुख्य ध्येय है व्यवस्था को सही आकड़ों तक पहुँचाना. इनकी दृष्टि में भी आम आदमी व उसके कार्य मात्र एक माध्यम हैं - वही सही आकड़ों तक पहुँचने में.
आगे तो आप समझ ही गए होंगे कि हमें कम से कम इस तरह के रिसोर्स पर्सन तो नहीं ही बनना चाहिए. तो फिर किस तरह का रिसोर्स पर्सन बनना चाहिए ? इसके बारे में लिखेंगे अगली बार!
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