Friday, 26 January 2018

जब नीलगाय से मिली मदद

आपको पता तो होता है कि ये कथन आने वाला है, लेकिन हर बार एक झटका जरूर लगता है।

"अब गरीब बच्चे हैं, दिमाग से कमजोर होते हैं, ज्यादा कुछ सीख नहीं पाते..."

इस पर मुझसे रहा नहीं गया। "गुरूजी, आप तो ऐसी बात कर रहे हैं जैसे कि कोई अस्पताल कह रहा हो, भई स्वस्थ लोगों को ही भेजो, रोगियों को नहीं! आप उस से क्यों नहीं शुरू करते जो आप के बच्चे जानते हैं?"

"क्या जानेंगे ये बच्चे जी? जंगल में ही रहते हैं, कुछ बता नहीं पाते."

"अच्छा ये बताइये कि नीलगाय और गाय में क्या फरक है?"

गुरजी सकपकाये. "और बिना नीचे देखे ये भी बताइये कि आपके पांव के आस-पास कौन-कौन सी पत्तियां पड़ी हैं."

फिर अंदाज़ लगाइये कि किस दिशा में बात हुई.




Monday, 23 July 2012

क्या हो स्वतंत्रता दिवस मानाने का 'सही' तरीका?


साथियों,

१५ अगस्त आने वाला है, और विचार ये है कि इसे सच में स्वतंत्रता दिवस की तरह मनाया जाए - सीखने की स्वतंत्रता, रोचक तरीके से सिखाने की स्वतंत्रता, बच्चों के हित में सुधार लाने की स्वतंत्रता. 

जिन बातों से बचना है, वे हैं वही पुराने भाषण (बच्चों, तुम देश का भविष्य हो!), वही कुंद रखने वाली रस्में (चुप-चाप बैठ कर LIP - local important person - को सुनना), देशभक्ति के गीत एक दिन चला कर अगले दिन भुला देना, या बड़ों के सामने बच्चों का प्रदर्शन करवाना (गीत, नृत्य, नाटक, आदि).

क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता जो सच में सीखने और स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ हो? जैसे, एक सत्र जहाँ शिक्षकों को बच्चों के मुश्किल सवालों का जवाब देना हो? या SMC के साथ बैठ कर बच्चों के सुझाव लिए जायें, स्कूल में सुधार लाने के लिए. या पता नहीं और क्या...

यहीं पर तो चाहिए हैं आपके सुझाव. अगर आप कर सकते, तो आप स्कूल में स्वतंत्रता दिवस कैसे मानते? ज़रूरी नहीं की आप स्कूल में हों - कोई भी हमें सुझाव भेज सकता है. हम कोशिश करेंगें कि सभी अच्छे सुझाव हजारों स्कूलों तक पहुंचें, और कुछ सैकड़ों उन्हें ज़रूर लागू करें! और फसबुक और अन्य माध्यमों से स्वतंत्रता दिवस मानाने के ये 'नए' तरीके ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचें.

अगर आपके मन में कोई विचार या सुझाव हो, तो comments में लिखने के साथ-साथ इस emai id पर ज़रूर लिखें: ignuspahal@gmail.com

धन्यवाद!


Monday, 18 April 2011

भाग २ - क्या हम अपनी कक्षाओं में बच्चों को भ्रष्ट्राचार सिखाते हैं?


इस पोस्ट का भाग १ मिलेगा - इधर 

एक और तरीका भी है जिस से हम कक्षा में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं. ये है इस बात पर बल देकर कि अपने आप सोचने की बजाये, दूसरों की नक़ल करो, अनुसरण करो, या उनके हिसाब से चलो. हमारी सदियों पुरानी परम्पराएँ आज्ञापालन  और बिना सोचे अपने से 'बड़ों' और बुजुर्गों और गुरुओं और अधिकारीयों को आदर  देना सिखाती हैं. ये जो हमारे 'ऊपर' हैं, इन पर कोई भी सवाल नहीं उठा सकता - इसे एक बहुत बड़ी बेईज्ज़ती समझा जाता है, केवल व्यक्ति की ही नहीं बल्कि 'कुर्सी' की, हमारी पुरानी परम्पराओं की और पूरे समाज के आधार की! 'अधिकार' वाले व्यक्ति की तो 'नीचे' वालों की ओर कोई जवाबदेही ही नहीं होती, और पूरी तरह 'सत्ता' उसके हाथ में होती है. और जैसा कि हम जानते ही हैं, सत्ता में आना भ्रष्ट्राचार को बढ़ावा दे सकता है.

इस सब के चलते हमारे स्कूलों में बच्चों को किस तरह के रोल मॉडल मिलते हैं? कई जगहों पर होते हैं ऐसे शिक्षक जो शायद समय पर नहीं आते हों, या पढ़ाते नहीं हों, या बच्चों से बुरा बर्ताव करते हों (पीटना तो कई बार दूसरे कामों की तुलना में इतना बुरा नहीं होता!), और अलग-अलग तरीकों से अपनी धाक जमाते हों, और बच्चों की ओर प्रतिबद्धता कम ही दिखाते हों. जब बच्चों को खुद ऐसे ही अधिकार वाली भूमिका दी जाती है (जैसे कि मोनिटर बनना या समूह का नेता), सबसे पहले वे उसी 'अधिकारी-पन' और 'धाक' कि नक़ल करते हैं. छोटी बच्ची भी जब गुड़ियों के साथ 'टीचर-टीचर' का खेल खेलती है तो वह छड़ी उठाकर चेतावनी देती हुई निगाहों से गुड़ियों की ओर देखती है! इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि बड़े होते-होते बच्चे ये ही समझ जाते हैं कि जब भी वे ऐसी पोजीशन में हों जहाँ वे दूसरों के 'ऊपर' हों, तो उन्हें अपना दबदबा जमाना है, जवाबदेही नहीं लेनी है और जो कुछ अपने लिए ले सकते हैं उसे हड़प लेना है भले ही दूसरों को कितना नुक्सान हो (आख़िरकार, आप की 'पोजीशन' आपके अपने लिए है, 'उनके' लिए नहीं). अगर ये भ्रष्टाचार नहीं तो क्या है?

शायद इसी वजह से हमारे समाज में और विशेषकर हमारी कक्षाओं में, जो बच्चा सवाल पूछता है उसे 'तंग करने वाला' समझा जाता है, उससे कहा जाता 'बहुत स्मार्ट मत बनो, नहीं तो देख लेंगे!' और यहीं आकर शिक्षा में सुधार की हमारी कोशिशें फुस्स हो जाती हैं. चूँकि नई 'सक्रिय' शिक्षण विधियाँ बच्चों के खुद से सोचने पर जोर देती हैं, और सवाल पूछने, खोज-बीन, चिंतन-विश्लेषण कर के अपने निष्कर्षों तक पहुँचने को बढ़ावा देती हैं - और इनके बारे में समझा जाता है कि ये तो हमारे समाज के आधार और कक्षाओं के परम्पराओं पर चोट पहुंचाती हैं.

अगर हमारी कक्षाएं ऐसे होती जहाँ बच्चे सवाल उठा सकते, उन्हें ये पूछने में देर नहीं लगती कि शिक्षक वे क्यों नहीं कर रहे हैं जो उन्हें करना चाहिए. वे समुदाय के साथ कई तरह के मुद्दे उठाते - सुविधाओं, स्कूल चलने के समय, प्रक्रियाओं और उनके अपने अधिकारों के बारे में... और भ्रष्ट्राचार व उसका रोल मॉडल बनाना मुश्किल हो जाता. तो हो सकता है कि आपको लगे कि मैं बेकार में ही इसे षड़यंत्र समझता हूँ, लेकिन मुझे तो लगता है कि 'शिक्षक का अनुपालन करो' भ्रष्टाचार को बनाये रखने और छोटी उम्र में बच्चों में भ्रष्ट बनने के सम्भावना को पैदा करने का हिस्सा ही है.

क्या हम अपनी कक्षाओं में बच्चों को भ्रष्ट्राचार सिखाते हैं?

देश भर में सैकड़ों, हजारों लोग भ्रष्टाचार के विरोध में उमड़ रहे हैं, अलग-अलग शहरों में घरों से बहार आ रहे हैं. और इस सब के पीछे, भ्रष्टाचार चुपके-चुपके हमारी कक्षाओं में जड़ पकड़ रहा है. देखने में यह इतना स्वाभाविक लगता है कि इसे भ्रष्ट्राचार की तरह देख पाना मुश्किल है. और यही कठिनाई भी है - हम व्यस्क लोग कई बार अपनी आखों के सामने हो रहे भ्रष्ट्राचार को भी नहीं पहचान पाते हैं क्योंकि यह वही संस्थागत आदत है जिसमें हम पले-बढ़े हैं.

कैसे होता है यह? उस बात से शुरू करिए जो सबके लिए सबसे ज्यादा मायने रखती है - परीक्षा के 'परिणाम'. ये इतने महत्वपूर्ण समझे जाते हैं की अगर हमें अछे 'मार्क' मिलें जिनके हम हक़दार नहीं हैं, तो भी ये मान्य हैं. यहाँ पर मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूँ जो नक़ल या बेईमानी करते हैं, बल्कि वे जो 'आखिरी क्षण' में पढ़ कर ठीक अंक ले आते हैं, या 'वे तीन सवाल जिनकी तैयारी की थी' पाकर अच्छा परिणाम पाते हैं. इन हालातों में, तथाकथित 'इमानदार' व 'सिंसीयर' छात्र (और उनके माता-पिता) भी वे लेने से नहीं कतराते जिसके वे हकदार नहीं हैं (और यही तो भ्रष्ट्राचार है).

परिणामों पर यह जोर हमें प्रक्रिया  को अनदेखा करने का प्रोत्साहन देता है. बच्चों को कहा जाता है कि जहाँ समझ में नहीं आ रहा है, वहां रट लें, और मेहनत कर के पढ़ने की बजाये इग्जाम गाइड का प्रयोग करें. इस हद तक होता है यह कि बच्चों को अगर सच में कुछ समझाने की कोशिश करो तो वे विरोध करते हैं, यह कहते हुए कि 'ये तो परीक्षा में आने वाला नहीं है.' छोटी उम्र में ही उन्होंने भ्रष्टाचार के बारे में एक महत्वपूर्ण सबक सीख लिया है - नतीजे की ओर देखो, प्रक्रिया को नज़रंदाज़ करो, और परीक्षा के पीछे के कारण की ही उपेक्षा करो: जो है सीखने को संभव और सुनिश्चित करना. आगे के जीवन में, भले ही ट्रेफिक के नियमों की बात हो या टैक्स देने की या सुरक्षा और कानून के नियमों की बात हो, सब को इसी तरह से नज़रंदाज़ और खोखला किया जाता है. उद्देश्य ये है की जो चाहते हो, कैसे भी पाओ, सिस्टम क्या है या क्यों बनाया गया है, ये सब जाए भाड़ में! और छोटी ही उम्र में ये सीखा जाता है हमारी कक्षाओं में.

इस पोस्ट का भाग २ मिलेगा इधर.

Sunday, 10 April 2011

प्रधान अध्यापक - क्या करे, क्या न करे?

आपकी नज़र में, वे कौन से तीन चीज़ें हैं जो प्रधान अध्यापकों को बिलकुल नहीं करनी चाहिए? और कौन सी तीन सच में करनी ही चाहिए? 

आपके जवाबों का इंतज़ार है. नीचे के कमेंट्स सेक्शन में लिखें.

(जैसा की आप समझ ही गए होंगे, प्रधान अध्यापकों के लिए प्रक्षिक्षण बनाया जा रहा है - आपके योगदान और भूमिका की सराहना की जाएगी!)

Thursday, 27 January 2011

क्या आज आपने अपने विचारों को धोया है?

टीवी के सामने कुछ मिनिट गुज़ारिए या किसी पत्रिका के पन्ने पलटिये, आप को विश्वास हो जायेगा कि अच्छा या खुबसूरत दिखना हमारे समाज में एक बहुत बड़ा लक्ष्य है! विज्ञापन पर विज्ञापन लदे हुए हैं - तरह-तरह की क्रीमों, फेस वॉश, शेम्पू, रेज़रों, गहनों, कपड़ों के - सब बताते हुए कि अब हम 'दिखना' युग में पहुँच चुके हैं. अगर आप वैसे 'दिखते' नहीं, तो जैसे आप हैं ही नहीं!

पर जैसे-जैसे हम अपने शरीरों को सवांरते हैं, अच्छा होगा अगर हम अपने मन को भी सवांरें. ऐसा नहीं कर पाने की वजह से ही हमारी बहुत सारी मुश्किलें पैदा हुई हैं या चलती जा रहीं हैं. उदहारण के लिए देखें हमारी शिक्षा व्यवस्था को, जिसमें ५७ लाख शिक्षक और करीब ३ लाख अधिकारी अलग-अलग स्तर पर हैं. अब अपने लुढ़कते-पुढ़कते ढंग से व्यवस्था चलती तो जा रही है, लेकिन इसके सामने भी यही समस्या है. हमारे चिंतन की धार इतनी कम हो चुकी है या कौशल इतने सीमित हो चुके हैं कि परिवर्तन के हरेक चरण पर बहुत बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.
  • शिक्षा से जुड़ा हरेक व्यक्ति (stakeholder) किस तरह चाहे गए बदलाव के कल्पना करे, या कैसे खुद अपना vision बनाये?
  • ऊपर से नीचे जितने लोग जुड़े हैं, वे कैसे इतने व्यापक और विशाल परिवर्तन की संकल्पना करें, उसे समझने की शुरुआत करें?
  • चूंकि परिवर्तन के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करना ज़रूरी है, कैसे हर व्यक्ति की मदद करें कि वह बेहतर योजना बना सके - अर्थात, चाहे गए लक्ष्य को पहचान सके, वर्तमान स्तिथि उनसे कितनी दूर है (या गेप्स क्या हैं) समझ सके, संभव 'हल' ढूंढ सके, अलग-अलग विकल्पों के बीच चुन सके कि कौन से सबसे उपयुक्त हैं, और क्रम और प्राथमिकता में अंतर पकड़ सके!
और अभी तो हम असली क्रियान्वयन पर पर पहुंचे भी नहीं. अमल करने वाले चरण पर तो कई सारे काम शामिल हैं, जैसे - पढाना और उसके लिए विभिन तरीकों का प्रयोग करना, मेंटरिंग करना, सम्प्रेषण, सुपरविज़न, प्रबंधन और संयोजन, मोनिटरिंग, काउंसेलिंग, आकलन और मूल्यांकन. ये सारे वे काम हैं जिनमें विभिन्न प्रकार के चिंतन कौशलों की ज़रूरत होती है. पहले-पहले तो ये जान कर ही झटका लगता है कि इनके लिए अलग-अलग तरह के सोचने के तरीके या अलग-अलग तरह के चिंतन-औजारों की ज़रूरत पड़ती है. याने, किसे भी काम को करने के पहले यह सोचना ज़रूरी है कि - यहाँ पर सोचने का सबसे अच्छा तरीका क्या होगा? कुछ उसी तरह जैसे कोई सर्जन किसी जटिल ऑपरेशन के हरेक चरण पर अलग-अलग औजारों का प्रयोग करता है.

इस स्तिथि से उभरने के लिए हम क्या कर सकते हैं? कुछ शुरुआती सुझाव:
  • जो भी प्रमुख क्रियाएँ / कार्य आप करतें हैं, उनकी सूची बनाएं
  • अब पहचानें कि इनमें आप कौन-कौन से चिंतन कौशलों या सोचने के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं (जैसे, क्या आप को अधिक सृजनात्मक होने की ज़रूरत पड़ती है, या आप को उपलब्ध जानकारी से बंध कर ही तार्किक नतीजों तक पहुंचना होता है?)
  • इन चिंतन कौशलों का अभ्यास करें
  • नए कदमों या एक्शन लेने के पहले, उपयुक्त चिंतन औजार / तरीके को चुनें
  • और अंत में, समय-समय पर अपने विचारों को धोना ना भूलें! याने, ये ज़रूर सोचें कि कहीं रोज़मर्रा के कामों में उपयोग किये जाने वाले विचार कहीं बासी तो नहीं हो गए हैं? या धूल से ढक तो नहीं गए हैं, या ज्यादा ही पुराने तो नहीं हो गए हैं? उन्हें त्याग कर नए विचारों को अपनाने की ज़रूरत तो नहीं है?
उम्मीद है कि 'दिखना' युग में भागीदार बनाने के साथ-साथ हम में से कम से कम कुछ लोग तो 'सोचना' युग की रचना ज़रूर करेंगे!

Wednesday, 26 January 2011

सभी शिक्षण-विधियों के 'दिल' मे

पिछले दो दशकों में तो शिक्षण-विधियों में जैसे विस्फोट-सा हुआ है. सरकारी संस्थाएं, अकादमिक संस्थाएं, गैर-सरकारी संस्थाएं और अब तो IT कंपिनयां और कॉर्पोरेट इंडस्ट्री द्वारा स्थापित गैर-सरकारी संस्थाएं भी सब पढ़ाने के अपने-अपने 'अचूक' नुस्खे दर्ज कर चुकी हैं. कक्षा की प्रक्रिया को 'रुचिकर' बनाया जायेगा, 'आनंददायी' गतिविधियाँ की जाएँगी, टी एल एम् और 'सीखने की सीढ़ियाँ' उपयोग में ली जाएँगी, वगैरह.

लेकिन इन सब की तह में जाएँ, तो हमें मिलेगा यह मूल सिद्धांत - अगर शिक्षक को सच में अपने बच्चों की परवाह है, तो वह रास्ता ढूंड लेगा. इन सारी शिक्षण विधियों का मतलब तब ही है जब शिक्षक को अपने बच्चों में रूचि हो और उन्हें सीखने में मदद कर के उसे आनंद आता हो. देखा जाए तो हमारे अधिकाँश प्रशिक्षण कार्यक्रम, सामग्री और शिक्षण-विधियों का दावा होता है कि वे शिक्षक को अधिक प्रभावशाली बना देंगे. लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि वे उन में बच्चों की ओर वह भावनात्मक प्रतिबद्धता पैदा करेंगी जो सफल कक्षा-प्रक्रियाओं की नीव होती है.

कैसे हो सकता है यह? जब तक शिक्षकों को खुद ही अपने 'शिक्षकों का प्रेम' पाने का अवसर नहीं मिला हो, वे अपने बच्चों को भी यह अनुभव नहीं दे सकते हैं. अधिकांश प्रशिक्षण कार्यक्रमों में,  इस भावनात्मक पहलू पर कम ही ध्यान दिया जाता है. यहाँ तक कि उन में भी जो शिक्षकों से अपेक्षाओं को स्वयं ठोस रूप से मॉडल करने की कोशिश करते हैं.

हाल के कार्यक्रमों में भाग लेने वाले शिक्षकों ने अपने बचपन में ऐसे ही शिक्षकों को देखा जिन्हें अपने बच्चों की विशेष परवाह नहीं थी. कुछ को तो यह भी लगता है कि अगर उनके शिक्षकों नें उनकी ओर सच में ध्यान दिया होता तो वे शिक्षक ना हो के कुछ और (बेहतर) काम कर रहे होते! इसके चलते, प्रशिक्षण के दौरान वे पाते हैं कि प्रशिक्षक को उनसे 'ऊपर' का दर्ज़ा दिया गया है, और कई बार तो भिड़ंत वाली स्तिथि रहती है. सेवा-कालीन प्रशिक्षण में तो यह और भी चुभने वाली बात बन जाती है, क्योंकि प्रशिक्षण से उनकी योग्यता या सर्विस कंडीशंस पर कोई असर नहीं पड़ता - और वे कई बार प्रशिक्षक की 'परीक्षा' लेते नज़र आते हैं, या ऊपर से हाँ कर के बाद में कक्षा में कुछ भी नहीं करते!

इसलिए बेहद ज़रूरी है कि ऐसी प्रशिक्षण प्रक्रिया हो जो सच में शिक्षकों को जोड़े, जहाँ उन्हें खुल कर अपनी बात कहने के मौके हों, वे अपने तर्क दे सकें और उन्हें गंभीरता से लिया जाये, जहाँ प्रशिक्षक उन्हें बुद्धि रखने वाले इंसान का दर्ज़ा दे. इस तरह की प्रशिक्षण प्रक्रिया शिक्षकों को एक ख़ास तरह की 'सफलता' का अनुभव देगी - अपनी खुद की समझ को रचने, अभिव्यक्त करने और प्रदर्शित करने की. और ये ही उन्हें सीखने-सिखाने की अद्भुत प्रक्रिया की ओर खींचेगी. ये वह ही अपनत्व का भाव या 'प्रेम' है जिसका अनुभव शिक्षकों ने अपने जीवन में पहले नहीं किया. अगर इस तरह से हम उनका दिल छू सकते हैं, तो शायद 'शिक्षण-विधि' की चिंता करने की ज़रूरत ही नहीं!


Sunday, 23 January 2011

बुद्धिजीवी या बुद्धूजीवी ?

कहीं ना कहीं आप का पाला इनसे ज़रूर पड़ा होगा - अपने आप को गहरा और दूसरों से 'हट के' ज्ञानी समझने वाले लोग. इनकी हरेक बात में 'कुछ' होता है - अब क्या होता है यह तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन कम से कम उन्हें तो लगता ही है कि 'कुछ' है. दुर्भाग्य से शिक्षा और विकास के क्षेत्र में तो अपने आप को 'अलग' दिखाते हुए ये दीखते ही रहते हैं. कभी उनके कपड़ों या बालों से यह झलकता है, कभी उनके चलने के 'विचारमय' ढंग से, और कहीं उनके बात रखने के अंदाज़ से.


     जैसे, चर्चा चल रही है कि 'आखिर करना  क्या है?' तो ये बोल उठेंगे: 'देखिये, इस मुद्दे पर आने के पहले, ये समझना बहुत ज़रूरी है कि....' - और फिर एक लम्बी भूमिका हो जायेगी शुरू. जब आप याद दिलाएंगे कि भई बात करनी है कि करना क्या है, तो थोड़ा सिर हिला के मुद्दे पर आएँगे और कहेंगे: 'जहाँ तक सवाल उठता है कि कौन से कदम उठाये जाएँ... ये तो हमें समझना ही होगी कि क्यों ज़रूरी है कि हम इस पर एक्शन लें...' और फिर इससे पहले कि आप उन्हें रोक पाएं, कुछ करने की आवश्यकता पर लम्बी टिप्पणी हो जाती है शुरू. 
    'भाई साहब, कुछ करना ज़रूरी है, इसीलिए तो बात कर रहें हैं कि करना क्या है! कदम भी तो सुझाएँ.'
    'देखिये, मैं नहीं मानता कि हमें आप को बस सीधे-सीधे बता देना चाहिए. कम से कम आप अपनी ओर से सोचें तो सही, उसके बाद ही हम जैसे लोगों कि सलाह लें.'
    'भैया बहुत सोचने के बाद ही तो हम आप से पूछ रहें हैं...'
    'अच्छा, ऐसा है तो सुनिए. पहले तो आप को प्रतिबद्धता से काम करना पड़ेगा. फिर, समस्या का गहराई से अध्ययन करें, संभावनाएं  खोजें, और उनमें से चुन कर हल निकालें.'
    'भायाराम, इतना तो हम भी सोच लिए थे, लेकिन करना  क्या है ये तो अभी भी नहीं पता लगा!


अब:

  • सामान्य सवाल: ये बताइए, ऊपर में से एक ना एक तो बुद्धूजीवी ज़रूर है  - कौन सा, पता कर सकते हैं? और क्यों उसे आप ये दर्ज़ा देना चाहते हैं?
  • थोड़ा डरावना सवाल: क्या आप ने इन में से किसी को अपने आस पास तो नहीं देखा है?
  • खतरनाक सवाल: अगर आप अपने आप में ही ये बुद्धूजीवी वाले गुण पा रहें हों, तो क्या करेंगे?

अपने विचार लिखना ना भूलें!

Wednesday, 29 December 2010

सुक्रात आये हमारे स्कूल

हाल ही की बात है - सुक्रात हमारे स्कूल आये. कहीं शायद जन्नत में भी बात चल रही थी कि भैय्या गजब का एक स्कूल है धरती पर, देखने लायक. इसलिए, करीब दो हज़ार साल के बाद सुक्रात धरती पर आये, और पहुँच गए सीधे हमारे स्कूल.
     बड़ा सा गेट है स्कूल की चारदीवारी पर - और उस में है दरवज्जा. ऊपर एक बोर्ड है - जिस पर लिखा है - "आदर्श विद्यालय, बालकों और बालिकाओं के लिए उत्कृष्ट शिक्षा". वहीँ पर मिल गए बड़े गुरूजी. सुक्रात जी तो और भी बड़े गुरूजी. दीखते ही उन्होंने पूछ डाला - 'ये आदर्श से क्या मतलब है आप का?'
     बड़े गुरूजी को दिखा कि कोई नाटा-सा मोटा बुड्ढा दो हज़ार साल पुराना लिबास ओढ़े उनसे सवाल पूछ रहा है. लेकिन आदर्श विद्यालय के प्राचार्य जो थे. उन्होंने अपने आप को संभाला और सभ्यता से उत्तर दिया: 'जी, आदर्श और उत्कृष्ट, दोनों का मतलब है कि बहुत अच्छा है हमारा स्कूल.'
     'इतनी हिंदी तो मुझे भी आती है,' सुक्रात जी ने कहा (जन्नत के वही चिकने टाइप के लोगों के साथ रह कर उनकी सहनशीलता थोड़ी कम हो चली थी). 'ये अच्छा क्यों कहते हैं आप अपने आपको?'
     बड़े गुरूजी दरवज्जे के आधे ही अन्दर थे. वे सोचने लगे कि अन्दर जाएँ या बहार आकर जवाब दें. उन्होंने भांप लिया कि कोई लम्बी बात वाला बुड्ढा है, और सुक्रात जी की कोहनी पकड़ कर उन्हें ही स्कूल के अन्दर खींच लिया. 'जनाब अच्छा इसलिए है क्योंकि हमारे बच्चों के रिजल्ट बहुत अच्छे आते हैं.'
     'रिजल्ट याने?'
     'जी, परीक्षा में अंक, और क्या.'
     सुक्रात जी ने एक हलकी सी फुंफकार मारी और अपने लिबास से थोड़ी से दो हज़ार साल पुरानी धूल झाड़ी और बोले, 'अच्छे अंक तो बच्चों को पीट कर भी लाये जा सकते हैं.'
     'लेकिन हम तो इतना ज्यादा नहीं पीटते हैं. वैसे भी अब तो कानून के तहत...'
     'पिटाई से मुझ को मतलब नहीं - कहने कि बात ये है कि अच्छे अंक पिटाई से लाये जा सकते है या नक़ल कर के भी. तो सिर्फ अच्छे अंक आ जाने से ही तो आप अपने आप को उत्कृष्ट विद्यालय नहीं कह सकते?'
     अब हमारे बड़े गुरु जी भी तो कोई कम थोड़े ना हैं. तपाक से बोल पड़े - 'अरे, ना पिटाई से, ना नक़ल से, बरन अच्छी पढ़ाई से हमारे बच्चे अच्छा करते हैं.' और उतनी ही तपाक से फँस भी गए.
     'तो अच्छी पढ़ाई से क्या मतलब है आप का?'
     'अच्छी पढ़ाई? अच्छी पढ़ाई याने... याने टीचर रोज़ नियमित पढ़ाता है, तयारी करता है, समझाता है, मीठी वाणी बोलता है...'
     'वैसे तो नियमित आकर भी कोई कमज़ोर तरीके से पढ़ा सकता है, है ना?'
     बड़े गुरूजी ने थोड़ा सोचा. अंत में बोले, 'अब तर्क के दृष्टिकोण से देखें तो हाँ, संभव तो है... कि समय पर आकर भी कोई साधारण ही पढ़ाता हो.' लेकिन ये कहते हुए वे थोड़े कम खुश दिख रहे थे.
     किन्तु सुक्रात जी भी तो सुक्रात जी ही थे ना. इतने से वे कहाँ मानने वाले थे. बोले: 'तो हमने देखा कि नियमित होना अच्छी पढाई के लिए एकदम अनिवार्य बात नहीं है. कुछ और चाहिए है. देखें तैयारी को. कोई गलत तैयारी भी कर सकता है, और ज़रूरी नहीं कि तैयारी करनी के बाद सच में वैसा ही पढ़ाये जैसी तैयारी की थी. अच्छी पढ़ाई के लिए तो कुछ और चाहिए है.'
     अब तक गुरूजी का भेजा फ्राई होना शुरू हो चुका था. उन्होंने अपने मेहमान के लिए चाय का आर्डर देने का विचार छोड़ दिया. पर इस सब से अनभिज्ञ, सुक्रात जी रोड रोलर की तरह बढ़ रहे थे. 'ये "समझाने" को अच्छी पढ़ाई क्यों कहा जाता है?'
     'मतलब?'
     'मतलब ये कि बहुत सारी बातें तो कौशल कि तरह होती हैं, जैसे तीरंदाजी या घुड़सवारी.' (सुक्रात जी अभी भी वही दो हज़ार साल पुराने और टिकाऊ टाइप के उदहारण का उपयोग कर रहे थे, लेकिन उनकी बात हस्त कौशल और मौलिक लेखन और कंप्यूटर गेम्स पर भी लागू हो सकती थी.) 'तो कौशल वाली बातें तो खुद कर के ही सीखी जाती हैं.'
     गुरूजी की आँखें सांकरी होने लगी थीं. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें गुस्सा आना चाहिए या उनकी हवाइयां उडनी चाहिए.
     उधर सुक्रात जी की आँखें हलकी सी बंद सी हो रही थीं. वे अपने पूरे प्रवाह में थे - दो हज़ार साल बाद कोई मुर्गा जो पकड़ में आया था. 'और फिर ये तो आप मानेंगे ही कि शिक्षा का बहुत बहुत बड़ा उद्देश्य है व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करना. इधर फिर से, केवल समझाना काफी नहीं है. छात्र तो शिक्षक के आचरण, उसके व्यवहार, उसके खुद के जीने के तरीके से सीखता है. इसके आलावा तर्क करना तो बहुत ही महत्वपूर्ण है. तर्क से ही छात्र के अपने विचार पकते है और उसके ताप में ही उसका चरित्र फौलाद कि तरह मज़बूत बनता है.'
     गुरूजी को तर्क का ताप तो बहुत मिल रहा था लेकिन उनके अन्दर का चरित्र चरमराता प्रतीत हो रहा था. इससे पहले कि वह पूरी तरह पिघल जाए, उन्होंने पूछ डाला: 'लेकिन समझाने से परीक्षा में मदद तो मिलती है; ये तो आप को मानना होगा?'
     सुक्रात जी एक क्षण के लिए चुप थे. गुरु जी ने सोचा कि राहत कि सांस ली जाये. इतने में सुक्रात जी ने धीरे से पूछा: 'तो क्या आप चरित्र की परीक्षा लेते हैं?'
     'हैं?' साइकिल के टायर से निकलती हवा की नक़ल करने के अंदाज़ में गुरूजी से आवाज़ निकली.


अब कहाँ जा कर यह डायलोग ख़त्म हुआ? क्या बड़े गुरूजी सुक्रात जी को वापस जन्नत में ठेलने में सफल हुए? क्या सुक्रात जी ने आखिर स्कूल के नाम से 'आदर्श' और 'उत्कृष्ट' भी हटवा दिया (और शायद 'स्कूल' भी!). पढ़िए अगली पोस्ट में!!

पी एस - चाहें तो अपनी ओर से डायलोग बना कर भी भेज सकते हैं; मैं कुछ उदहारण आगे की पोस्टों में शामिल करूँगा.











Sunday, 12 December 2010

कहीं आप पाठ्यपुस्तक के शिकार तो नहीं?

हम अपने बचपन से ही पाठ्यपुस्तकों के इतने आदि हो चुके हैं कि हमें ख्याल ही नहीं आता कि वे मुश्किलें भी पैदा कर सकती हैं. अगर आप शिक्षक हैं, या किसी भी तरह से शिक्षा से जुड़े हैं, तो पाठ्यपुस्तकों के इन तीन पहलुओं पर ज़रूर गौर करें - ये ऐसे हैं कि आपको या आपके बच्चों को सच में नुकसान पहुंचा सकते हैं!
  • पहला, ना जाने क्यों, बहुत सारे लोग पाठ्यपुस्तक को ही पाठ्यचर्या समझ लेते हैं! सोचा जाता है कि शिक्षक का काम याने पुस्तक 'पूरा' करना. जैसे कि इसके अलावे कुछ और हो ही ना. दुर्भाग्य से किसी भी पाठ्यचर्या में इतना कुछ होता है जो कि पुस्तक द्वारा कवर नहीं किया जाता - जैसे, दूसरों के सामने आत्मविश्वास से बोलना, दूसरों से बहस करते हुए भी उनके दृष्टिकोण का आदर करना, तर्कसंगत रवैय्या अपनाना, समस्याएँ सुलझाना, सृजनशीलता और कल्पना, वैज्ञानिक मानसिकता...  ये ऐसे उद्देश्य हैं जो कि 'अध्यायों' या 'पाठों' के माध्यम से पूरे नहीं किये जा सकते हैं. हाँ, ऐसी पाठ्यपुस्तकें ज़रुर बनाई जा सकती हैं जिनमें ये पहलू हों, पर क्या आपका कभी इनसे पाला पड़ा है? इसलिए, पाठ्यपुस्तकों पर पहला आरोप है: पाठ्यपुस्तकें शिक्षा को उन बातों तक सीमित कर देती हैं जो पुस्तकों में समा सकती हैं, और वो शामिल भी नहीं करती हैं जो कि किया जा सकता है.
  • दूसरे, सीखने कि शुरुआत या खोज-बीन का बहाना (जिसके सहारे बच्चा खुद जूझ कर अपनी समझ की रचना करे) बनने कि बजाये, पाठ्यपुस्तकें खुद ही अपने आप में एक अंत बन जाती हैं. हम सब ने ये वाक्य ज़रूर सुना होगा, कि पाठ्यपुस्तकें वेद-पुराण की तरह बन गयी हैं - जिन पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है, और जिनमें शामिल की गयी बातों का बिना कुछ पूछे पालन किया जाना है. आज के ज़माने में क्या किसी शैक्षिक सामग्री की ये भूमिका हो सकती है? इसलिए, दूसरा आरोप: पाठ्यपुस्तकें साधन की जगह साध्य बन चुकी हैं.
  • तीसरा, और सबसे बड़ा 'जुर्म' है कि पाठ्यपुस्तकें बहुत बड़ी तादाद में बच्चों को सीखने की प्रक्रिया से बाहर रखने के लिए ज़िम्मेदार हैं. वे शिक्षक को बाध्य करती हैं कि वह सभी को एक ही गति से पढाये, सभी एक ही पन्ने पर हों और एक ही चीज़ पर काम कर रहें हों. बहुत सारे बच्चे, विशेष तौर पर वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले, इस गति पर नहीं चल पाते हैं. न ही उनके सीखने के तरीके किताब में कहीं झलकते हैं. इस सब के आलावा, पुस्तकें तथाकथित 'मानक' भाषा में लिखी होती हैं जो कि बच्चों की घर की भाषा से अलग होती है, और ऐसी संस्कृति दर्शाती है जो उनके लिए परे होती है. (मेरा विश्वास न करें, किसी   पाठ्यपुस्तक को उठायें और अपने आप से पूछें कि अगर आप झुपड़पट्टी या सड़क पर रहने वाले या आदिवासी बच्चे  होते, तो क्या आपकी दुनिया इस किताब में कहीं भी झलक रही है.) धीरे-धीरे, ये बच्चे कक्षा में चुप होते जाते हैं औरे सीखने की प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं, या कभी-कभी तो स्कूल से ही... अतः, तीसरा आरोप: पाठ्यपुस्तकें बच्चों को हाशिये पर लाने औरे सीखने से बाहर करने, और जो पहले से ही वंचित हैं उनसे और मौके छीनने के लिए ज़िम्मेदार हैं.
तो क्या इसका मतलब यह है कि पाठ्यपुस्तकें होनी ही नहीं चाहिए? जी नहीं, इसका मतलब है की पाठ्यपुस्तकों की ये कमज़ोरियाँ बिलकुल भी मान्य नहीं हैं, और आगे बनने वाली किताबों का रूप, गुण और उपयोग पहले से कहीं अलग होना चाहिए! किस तरह अलग? ये ही तो आप हमें लिख कर सुझायेंगे!

Monday, 29 November 2010

अगर आप स्कूली शिक्षा में तीन चीज़ें ही बदल सकते, तो वे क्या होतीं?

पिछले दो दशकों से शिक्षा में सुधार पर काम करते-करते अब हमारे पास इतने ज्यादा विचार / सुझाव हो गए हैं कि समझ ही नहीं आता कि इस गुत्थी के छोर किस ओर है! इसीलिए आप से पूछ रहा हूँ कि आप अगर तीन चीज़ें ही बदल सकते, तो वे क्या होतीं? अगर कई लोगों को कुछ बदलाव ज़रूरी या शुरुआत के लिए अच्छे लगते हैं, तो हो सकता है कि हमें दिशा मिले.

अतः, आप के सुझाव आमंत्रित हैं, कृपया इस मामले में कंजूसी ना दिखायें, जल्द ही सोचें और लिखें. [आप अंग्रेजी लिपि में हिंदी लिख सकते हैं, कमेंट्स के लिए विचार चाहिए, अंग्रेजी नहीं!]

क्या होता है 'बेहतर स्कूल'?

यह भी कोई सवाल हुआ? अरे भाई, बेहतर स्कूल वही है जो अच्छा स्कूल होता है. जहाँ अच्छी पढाई होती है, बच्चे और शिक्षक और माँ-बाप सब स्कूल से खुश हैं - यही तो हुआ ना बेहतर स्कूल?

दुर्भाग्य से इस मासूम परिभाषा के दिन पूरे हो चुके हैं. 'मासूम' इसलिए क्योंकि बिना ख़ास सोचे समझे कुछ बातें कह दी गयीं - इनके पीछे की गहराइयों को नहीं समझा गया. साथ ही, यह परिभाषा ऐसी है कि इसे पढ़ कर कोई समझ नहीं सकता कि आखिर करना क्या है? आप समझ पाए? मैं तो नहीं समझ पाया! नहीं, ऐसी परिभाषा चाहिए है जो केवल शब्दों में न रहे, बल्कि जिसे ठोस कदमों में बदला जा सके. और अब शिक्षा के अधिकार कानून आने के बाद तो यह और भी out-dated (पुरानी) हो चुकी है.

आज के सन्दर्भ में, अगर 'अच्छे' या 'बेहतर' स्कूल की ओर बढ़ना है, तो आगे दी गई बातों पर ध्यान देना होगा. [आगे बढ़ने के पहले एक कॉपी लें ताकि ज़रूरी बातों को लिखते रह सकें, यहाँ दिए गए सवालों के जवाब भी नोट कर पाएं.]


एक शिक्षक ने कहा,'मेरा स्कूल बिल्डिंग में नहीं है. वह तो उसमें है जो मेरे बच्चों और मेरे बीच होता है. और कोई उसे तोड़ या चुरा नहीं सकता!'

बात गहरी है, और 'अच्छे स्कूल' की परिभाषा के लिए अहम् भी. [आगे पढ़ कर लिखें कैसे]


तीन पहलुओं को मिल कर बनता है एक स्कूल. ये हैं -
- नतीजे
- प्रक्रियाएं
- सम्बन्ध

सिर्फ तीन? आप सोच रहे होंगे कि इतने से हो जाएगा काम? देखिये आगे कि क्या निकल कर आता है इनसे.

नतीजे
आम तौर पर इस पहलू को सभी देखते हैं - परीक्षाफल कैसा है आपका? अगर अच्छा तो ज़रूर स्कूल अच्छा होगा. फिर वही मासूम टाइप की बात! यह तो आप जानते ही हैं कि रिज़ल्ट चीटिंग कर के या पिटाई का भय दिखा कर भी लाये जा सकते हैं.

पर इस से भी ज्यादा ज़रूरी है कि किस तरह के नतीजे आप को सच में चाहिए हैं. क्या आप चाहते हैं कि आप का कोई छात्र गणित में तो बहुत अच्छा हो लेकिन इन्सान की तरह बिलकुल बेकार? या आप चाहते हैं कि परीक्षा में छात्र अच्छे अंक लायें ही, भले ही वे अपनी सीखी बातों को जीवन में या वास्तविक स्तिथियों में उतार पाएं या नहीं?

और फिर विषयों के अन्दर भी तो सीखने के बहुत सारे स्तर होते हैं. जो ज्यादा अहम् बातें हैं या उच्च-मानसिक स्तर वाले लक्ष्य हैं, क्या उन्हें अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए? लेकिन कई पहलू ऐसे हैं (जैसे कि वैज्ञानिक मानसिकता, या प्रयोग कर पाने की क्षमता या मौलिक अभिव्यक्ति या तथ्यों के बीच अंतर्संबंध पहचान पाना) जो महत्वपूर्ण होते हुए भी आंके नहीं जाते, अतः विकसित भी नहीं किये जाते.

तो अपने पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए अपने आप से पूछें (और नोटबुक में लिखें!):

  • सच में क्या है जो महत्वपूर्ण है और जो हम चाहते हैं कि बच्चों के अन्दर सच में विकसित हो? 
  • क्या इसके लिए पर्याप्त मौके दिए जा रहे हैं? 
  • अगर नहीं तो आगे क्या करना चाहिए?

यहाँ पर आप के जवाब बड़े ही महत्वपूर्ण हैं - वे तय कर देते हैं कि आप के स्कूल के 'अच्छा' स्कूल बनने की सम्भावना है भी कि नहीं!

एक बार इन सवालों पर आप अपनी सोच स्पष्ट कर लेते हैं तो अगला और स्वाभाविक सवाल होगा - तो ये सब होगा कैसे? और यह पहुंचा देता है हमें अपने अगले पहलू की ओर - प्रक्रिया!

और इस पर लिखूंगा अगली पोस्ट में!

Saturday, 16 October 2010

क्यों बदलूं मैं अपने आप को?

अगर आप शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हैं तो आज कल अपने आप को बदलने का काफी दबाव झेल रहे होंगे. जैसे गब्बर सिंह के आने का डर था, वैसे ही आर टी ई (शिक्षा का अधिकार कानून) का भी खौफ फ़ैल रहा है!

लेकिन अपने आप को बदलने के कारण तो वास्तव में कुछ और हैं. जो बदलाव चाहे गए हैं, वे वही हैं जिन से हम भी सहमत होंगे - जैसे बच्चों की ज़रूरतों को महत्व देना, अपने काम को प्रभावशाली तरीके से करना, बिने शारीरिक व मानसिक हिंसा के.

इसी लिए अपने आप को बदलने के कारण कुछ इस प्रकार हैं -
१. नए तरीकों से पढ़ाने में मज़ा आता है, बोझ कम हो जाता है, और कम काम/उर्जा से अधिक परिणाम मिलता है.  (आपको विश्वास नहीं होता तो कमेन्ट डालिए, मैं  विस्तार से लिखूंगा)
२. हम व्यवसायिक लोग हैं, एक मानक के हिसाब से अच्छा काम करके पैसा लेते हैं.
३. हमारा हक है कि हम अपने व्यवसायिक जीवन का आनंद लें!

ये तो थी आसान बात. लेकिन असली सवाल है कि बदलें क्या? और किस तरह से? इन पर पहले आप के सुझाव हो जाएँ, फिर मैं अपनी ओर से लिखूंगा.

Tuesday, 12 October 2010

कैसे रिसोर्स पर्सन नहीं बनें

जब भी शिक्षा में दिशा तय करने की कोशिश होती है तो दो अलग तरह के स्रोतों पर जोर होता है. पहला तो है, शिक्षा के पितामाह किस्म के सीनियर लोग, जो कि आस्था चैनेल की तरह लम्बे-लम्बे प्रवचन देतें हैं और माना जाता है कि हम नादान लोगों को इससे प्रेरणा व दिशा मिलती है. आजकल इनके कुछ छोटे भाई भी हो गए हैं, जिन्हें हम मठादीश की उपाधि देंगे -- ये किसी एक विचारधारा के समर्थक होते हैं और मानते हैं कि जो भी इनके दायरे में नहीं आता, वह तो बात करने लायक भी नहीं है. कुल मिला कर ये दोनों तरह के लोग भक्तों की तलाश में रहते हैं. कहीं ना कहीं यह धारणा भी रहती है कि ये सच में बहुत कुछ जानते हैं और बाकी लोग दिमाग से कमज़ोर हैं.

दूसरा स्रोत है - आंकड़े-धारी लोग. इनके पास तरह-तरह की जानकारी होती है - बच्चों, शिक्षकों, स्कूलों, आदि के बारे में. इनकी नज़र में प्लैनिंग व क्रियान्वयन के मुख्य ध्येय है व्यवस्था को सही आकड़ों तक पहुँचाना. इनकी दृष्टि में भी आम आदमी व उसके कार्य मात्र एक माध्यम हैं - वही सही आकड़ों तक पहुँचने में.

आगे तो आप समझ ही गए होंगे कि हमें कम से कम इस तरह के रिसोर्स पर्सन तो नहीं ही बनना चाहिए. तो फिर किस तरह का रिसोर्स पर्सन बनना चाहिए ? इसके बारे में लिखेंगे अगली बार!

Saturday, 9 October 2010

मिस्ड कॉल बच्चों की

जब से मोबाइल फ़ोन सस्ते हुए हैं, हम सब ज़रूरत पड़ने पर मिस्ड कॉल मार रहे हैं. बोला भी जाता है, 'कुछ चाहिए हो तो मिस्ड कॉल मार देना.'  लेकिन ज़रूरी नहीं कि हर तरह की मिस्ड कॉल केवल फ़ोन से ही मारी जाए. देखें तो हर जगह हम एक दूसरे को कई तरीकों से इशारे करते रहते हैं, संकेत देते रहते हैं और रेस्पोंस भी करते हैं.

इसी तरह कक्षा में भी बच्चे हमें कॉल मारते रहते हैं, लेकिन हम मिस ही करते रहते हैं! उनके चेहरे, हाव-भाव और उत्साह में अचानक कमी से हमको पता चलना चाहिए कि वे हमारी बातें समझ रहे हैं कि नहीं, मन से भाग ले रहे हैं या नहीं... उनके किये गए काम से दिख जाता है कि हम उन तक पहुँचने में कितने सफल रहे.

अगर हमारे कमरे में घुसते ही शांति हो जाये या रौनक बढ़ जाये तो हमें कुछ सन्देश दिया जा रहा है. बच्चे कक्ष में अपने काम के लिए बेहिचक घूमते हैं या एक दूसरे की मदद करते हैं, तो वे हमें बता रहे हैं कि वे हम पर पूरी तरह विश्वास करते हैं. क्या बच्चे हमारे पास आने से कतराते हैं या खुल कर अपनी बात बताते हैं? क्या वे हमारी आँखों में आँखें डाल कर बातें कर पाते हैं?

ये हैं कुछ मिस्ड कॉल जो बच्चे हमें मारते हैं. और कौन-कौन सी कॉलें हैं जिन्हें हम मिस करते रहते हैं?

और क्या इसी तरह प्रक्षिक्षण के दौरान आप भी अपने प्रशिक्षक को मिस्ड कॉल मारते हैं? और क्या वे कॉलें ली जाती हैं?

Wednesday, 6 October 2010

मेहनती नहीं, स्मार्ट बनिए !

जब भी शिक्षकों का प्रशिस्क्षण किया जाता है, उन्हें तरह-तरह की घिसी-पिटी बातें बताई जाती हैं. 'आप देश का भविष्य हैं, बहुत ज़िम्मेदारी है आपके कन्धों पर, जाइए जा कर खूब मेहनत करिए.' है न? सुनाया जाता है कि नहीं? और बार-बार सुन कर कान पक चुके हैं कि नहीं?

दरअसल यह बड़ा मासूम सा विचार है - जैसे कि केवल मेहनत करने से सब कुछ हो जाता है. नहीं भैय्या, दिमाग लगाना पड़ता है, दिमाग! जिन लोगों का काम केवल मेहनत का ही माना जाता है, वे लोग अपना दिमाग लगा कर ही ठीक से काम कर सकते हैं -- जैसे कि ट्रक से सामान उतारने वाले लेबरर, खेत में काम करता किसान, गड्ढा खोदने या सिर पर मलबा ढोने वाले लोग. अगर वे बिना सोचे-समझे अपना काम करें तो उन्हें चोट लग सकती है, नुकसान हो सकता है, फटकार लग सकती है.... तो शिक्षक के मामले में तो ये बात कहीं और ज्यादा लागू होगी!

स्मार्ट शिक्षक कक्षा में बच्चों की भूमिका बहुत अधिक बढाते हैं - और केवल साफ़-सफाई और रख-रखाव के मामले में ही नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया में. उदहारण के लिए चौथी कक्षा की शिक्षिका ने बच्चों से कहा,"जानते हो इस कहानी में एक दिन जब सिंह सो कर उठा, तो उसके सिर पर बाल ही नहीं थे. फिर उसने क्या किया अपने बाल वापिस पाने के लिए? पढो और पता करो!'

जब बच्चे पढने लगे तो वह उन बच्चों के साथ बैठ गयी जो कि पीछे छूटने के खतरे में थे. थोड़े समय के बाद उसने सबसे कहा, 'पढ़ कर जो शब्द समझ में नहीं आते हैं, उन पर गोला लगाओ. फिर अपने पड़ोसी से पूछो.' जब सबने यह काम कर लिया तो उसने समूह को कहा कि एक दूसरे से गोले लगे शब्दों के अर्थ पता करो. जो तुम लोग नहीं कर पाओगे, वे शब्दों को में बता दूँगी.'

आप सोच सकते होंगे कि इसके बाद उसने क्या किया होगा. पूरे समय इस शिक्षिका का हरेक बच्चा काम पर लगा रहा, सीखता रहा, दूसरों को सिखाता रहा, और वह खुद बहुत ही रेलाक्स्ड रही!

क्या हम भी इस तरह थोड़े आलसी और स्मार्ट बन सकते हैं?

Monday, 4 October 2010

क्या पढ़ायें - पाठ्यचर्या या पाठ्यक्रम या पाठ्यपुस्तक?

आम तौर पर यही माना जाता है कि हमारा काम है पाठ्यपुस्तक को अच्छे से 'कवर' करना. लेकिन कोई भी पाठ्यपुस्तक अपने आप में पूरी शिक्षा के बराबर नहीं होती. वास्तव में वह उसका हिस्सा ही होती है, और तय किये गये लक्ष्यों को हासिल करने के लिए मात्र एक सामाग्री. यानी, वह साध्य वहीँ बल्कि एक साधन है. यहाँ तक कि बहुत सारे देशों में तो पाठ्यपुस्तक ही नहीं होती. और हमारे गुरुकुलों में भी नहीं होते थी, क्योंकि गुरु ही तय करते थे कि कौन क्या सीखेगा, कितना और कैसे सीखेगा.

वास्तावे में तो पढ़ाने की सही दिशा मिलती है पाठ्यचर्या (curriculum) से. यह बताता है कि हमारे यहाँ चल रही शिक्षा के महत्वपूर्ण उद्देश्य क्या हैं, किस तरह के बच्चों व समाज की कल्पना की गयी है, विषयों का क्या महत्व समझा गया है, और चाही गयी शिक्षा का व्यवहारिक रूप देने के लिए क्या सुझाया गया है.

इसी का एक हिस्सा होता है पाठ्यक्रम (syllabus) जो कि मुख्य तौर पर विषयों पर केन्द्रित होता है, कक्षानुसार सीखने के लक्ष्य, उनके क्रम व अनुपात (यानी कितना पढ़ाना है) को साफ़-साफ़ रखता है. यह भी बताता है कि मूल्यांकन में किन बिन्दुओं पर कितना जोर होगा.

हालाँकि पाठ्यपुस्तक को पाठ्यचर्या व पाठ्यक्रम के आधार पर ही बनाया जाता है, सीखने के कई लक्ष्यों को पुस्तक में शामिल ही नहीं किया जा सकता - जैसे कि प्रवाह से भाषा का प्रयोग करना, तर्क करना, वैज्ञानिक मानसिकता, व सामाजिक कौशलों का विकास, आदि, आदि. इस बात को मानना ज़रूरी नहीं है - अपने यहाँ के पाठ्यचर्या व पाठ्यक्रम का उठायें और पाठ्यपुस्तकों से तुलना कर के देख लें.

तो फिर पढ़ाएंगे कैसे? प्लानिंग कैसे करेंगे कि क्या पढ़ाना है, किस क्रम में, और कितना? जी हाँ, सही बताया आपने - पाठ्यचर्या व पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए पाठ योजना / पढ़ाने की योजना बनायेंगे. इस योजना में उपयुक्त जगह पर पाठ्यपुस्तक का उपयोग भी करेंगे!

Saturday, 2 October 2010

जो जहाँ है वहीँ कुछ करे, और अच्छे से करे

सुधार की बात आते ही हमें लगता है की 'हम क्या करें? ये तो ऊपर वाले तय करेंगे.' लेकिन ऐसी सैकड़ों चीज़ें हैं जो हम खुद ही कर सकते हैं, जिनके लिए हमें न तो कोई आदेश / निर्देश की ज़रूरत है, न पैसे की, न ही किसी विशेष कौशल की. 


जैसे अगर हम शिक्षक हैं तो:

  • बच्चों की ओर देख कर मुस्करा सकते हैं! कई बार इसी से बहुत फर्क पड़ सकता है. और यह सबसे आसान चीज़ है.
  • पाठ पढ़ाने के पहले थोड़ी सी तयारी कर सकते हैं (बहुत सारे स्कूलों में तो संदर्शिकाएं भी उपलब्ध हैं).
  • इस पर नज़र रख सकते हैं की कौन से बच्चे पिछड़ने के खतरे में हैं - और उन पर थोड़ा अधिक जोर दे सकते हैं.
  • समय-समय पर देख सकते हैं की बच्चों को समझ में आ रहा है कि नहीं.

और भी बहुत कुछ होगा जो आसानी से किया जा सकता है - सुझाव आमंत्रित हैं!


अगली बार - अगर आप सी आर सी पर हैं, तो आप क्या कर सकते हैं?

Friday, 1 October 2010

पागलों की बिरादरी

पागलों की बिरादरी - यह भी कोई बात होती है?

जी हाँ, यह उन लोगों की बात हो रही है जो सच में कुछ करने की कोशिश करते हैं और पाते हैं की दूसरे उन्हें पागल का दर्ज़ा देते हैं. जैसे जब एक शिक्षक सच में पढ़ने लगता है तो बाकी शिक्षक कहते हैं, "अरे, पागल तो नहीं हो गए? तुम ऐसा करोगे तो हम सब को भी सच में पढ़ना पड़ेगा."

वर्षों तक झेलने के बाद, अब ये सारे 'पागलों' ने एक दूसरे को ढूंढना शुरू कर दिया है. अगर आप शिक्षा में काम करते हैं, और चाहते हैं की जहाँ भी हैं, अच्छा काम करें, तो बिरादरी में आपका स्वागत है!