Sunday, 23 January 2011

बुद्धिजीवी या बुद्धूजीवी ?

कहीं ना कहीं आप का पाला इनसे ज़रूर पड़ा होगा - अपने आप को गहरा और दूसरों से 'हट के' ज्ञानी समझने वाले लोग. इनकी हरेक बात में 'कुछ' होता है - अब क्या होता है यह तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन कम से कम उन्हें तो लगता ही है कि 'कुछ' है. दुर्भाग्य से शिक्षा और विकास के क्षेत्र में तो अपने आप को 'अलग' दिखाते हुए ये दीखते ही रहते हैं. कभी उनके कपड़ों या बालों से यह झलकता है, कभी उनके चलने के 'विचारमय' ढंग से, और कहीं उनके बात रखने के अंदाज़ से.


     जैसे, चर्चा चल रही है कि 'आखिर करना  क्या है?' तो ये बोल उठेंगे: 'देखिये, इस मुद्दे पर आने के पहले, ये समझना बहुत ज़रूरी है कि....' - और फिर एक लम्बी भूमिका हो जायेगी शुरू. जब आप याद दिलाएंगे कि भई बात करनी है कि करना क्या है, तो थोड़ा सिर हिला के मुद्दे पर आएँगे और कहेंगे: 'जहाँ तक सवाल उठता है कि कौन से कदम उठाये जाएँ... ये तो हमें समझना ही होगी कि क्यों ज़रूरी है कि हम इस पर एक्शन लें...' और फिर इससे पहले कि आप उन्हें रोक पाएं, कुछ करने की आवश्यकता पर लम्बी टिप्पणी हो जाती है शुरू. 
    'भाई साहब, कुछ करना ज़रूरी है, इसीलिए तो बात कर रहें हैं कि करना क्या है! कदम भी तो सुझाएँ.'
    'देखिये, मैं नहीं मानता कि हमें आप को बस सीधे-सीधे बता देना चाहिए. कम से कम आप अपनी ओर से सोचें तो सही, उसके बाद ही हम जैसे लोगों कि सलाह लें.'
    'भैया बहुत सोचने के बाद ही तो हम आप से पूछ रहें हैं...'
    'अच्छा, ऐसा है तो सुनिए. पहले तो आप को प्रतिबद्धता से काम करना पड़ेगा. फिर, समस्या का गहराई से अध्ययन करें, संभावनाएं  खोजें, और उनमें से चुन कर हल निकालें.'
    'भायाराम, इतना तो हम भी सोच लिए थे, लेकिन करना  क्या है ये तो अभी भी नहीं पता लगा!


अब:

  • सामान्य सवाल: ये बताइए, ऊपर में से एक ना एक तो बुद्धूजीवी ज़रूर है  - कौन सा, पता कर सकते हैं? और क्यों उसे आप ये दर्ज़ा देना चाहते हैं?
  • थोड़ा डरावना सवाल: क्या आप ने इन में से किसी को अपने आस पास तो नहीं देखा है?
  • खतरनाक सवाल: अगर आप अपने आप में ही ये बुद्धूजीवी वाले गुण पा रहें हों, तो क्या करेंगे?

अपने विचार लिखना ना भूलें!

3 comments:

  1. haan.
    aksar mil jate hain.
    sudhar.

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  2. My god, kafi darawana article tha

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  3. unki style itni khatarnaak hoti hai ki aapko consontrate to karti hi hai, hum dimag par khub jor dalte hai, ki ye janab kahena kya chahte hai?
    Lekin unki baat ghum fir kar wahi ke wahi aakar raheti hai..

    Mai to fir unse bachne ka upaay hi sochta hoon.

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