Monday, 23 July 2012

क्या हो स्वतंत्रता दिवस मानाने का 'सही' तरीका?


साथियों,

१५ अगस्त आने वाला है, और विचार ये है कि इसे सच में स्वतंत्रता दिवस की तरह मनाया जाए - सीखने की स्वतंत्रता, रोचक तरीके से सिखाने की स्वतंत्रता, बच्चों के हित में सुधार लाने की स्वतंत्रता. 

जिन बातों से बचना है, वे हैं वही पुराने भाषण (बच्चों, तुम देश का भविष्य हो!), वही कुंद रखने वाली रस्में (चुप-चाप बैठ कर LIP - local important person - को सुनना), देशभक्ति के गीत एक दिन चला कर अगले दिन भुला देना, या बड़ों के सामने बच्चों का प्रदर्शन करवाना (गीत, नृत्य, नाटक, आदि).

क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता जो सच में सीखने और स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ हो? जैसे, एक सत्र जहाँ शिक्षकों को बच्चों के मुश्किल सवालों का जवाब देना हो? या SMC के साथ बैठ कर बच्चों के सुझाव लिए जायें, स्कूल में सुधार लाने के लिए. या पता नहीं और क्या...

यहीं पर तो चाहिए हैं आपके सुझाव. अगर आप कर सकते, तो आप स्कूल में स्वतंत्रता दिवस कैसे मानते? ज़रूरी नहीं की आप स्कूल में हों - कोई भी हमें सुझाव भेज सकता है. हम कोशिश करेंगें कि सभी अच्छे सुझाव हजारों स्कूलों तक पहुंचें, और कुछ सैकड़ों उन्हें ज़रूर लागू करें! और फसबुक और अन्य माध्यमों से स्वतंत्रता दिवस मानाने के ये 'नए' तरीके ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचें.

अगर आपके मन में कोई विचार या सुझाव हो, तो comments में लिखने के साथ-साथ इस emai id पर ज़रूर लिखें: ignuspahal@gmail.com

धन्यवाद!


Monday, 18 April 2011

भाग २ - क्या हम अपनी कक्षाओं में बच्चों को भ्रष्ट्राचार सिखाते हैं?


इस पोस्ट का भाग १ मिलेगा - इधर 

एक और तरीका भी है जिस से हम कक्षा में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं. ये है इस बात पर बल देकर कि अपने आप सोचने की बजाये, दूसरों की नक़ल करो, अनुसरण करो, या उनके हिसाब से चलो. हमारी सदियों पुरानी परम्पराएँ आज्ञापालन  और बिना सोचे अपने से 'बड़ों' और बुजुर्गों और गुरुओं और अधिकारीयों को आदर  देना सिखाती हैं. ये जो हमारे 'ऊपर' हैं, इन पर कोई भी सवाल नहीं उठा सकता - इसे एक बहुत बड़ी बेईज्ज़ती समझा जाता है, केवल व्यक्ति की ही नहीं बल्कि 'कुर्सी' की, हमारी पुरानी परम्पराओं की और पूरे समाज के आधार की! 'अधिकार' वाले व्यक्ति की तो 'नीचे' वालों की ओर कोई जवाबदेही ही नहीं होती, और पूरी तरह 'सत्ता' उसके हाथ में होती है. और जैसा कि हम जानते ही हैं, सत्ता में आना भ्रष्ट्राचार को बढ़ावा दे सकता है.

इस सब के चलते हमारे स्कूलों में बच्चों को किस तरह के रोल मॉडल मिलते हैं? कई जगहों पर होते हैं ऐसे शिक्षक जो शायद समय पर नहीं आते हों, या पढ़ाते नहीं हों, या बच्चों से बुरा बर्ताव करते हों (पीटना तो कई बार दूसरे कामों की तुलना में इतना बुरा नहीं होता!), और अलग-अलग तरीकों से अपनी धाक जमाते हों, और बच्चों की ओर प्रतिबद्धता कम ही दिखाते हों. जब बच्चों को खुद ऐसे ही अधिकार वाली भूमिका दी जाती है (जैसे कि मोनिटर बनना या समूह का नेता), सबसे पहले वे उसी 'अधिकारी-पन' और 'धाक' कि नक़ल करते हैं. छोटी बच्ची भी जब गुड़ियों के साथ 'टीचर-टीचर' का खेल खेलती है तो वह छड़ी उठाकर चेतावनी देती हुई निगाहों से गुड़ियों की ओर देखती है! इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि बड़े होते-होते बच्चे ये ही समझ जाते हैं कि जब भी वे ऐसी पोजीशन में हों जहाँ वे दूसरों के 'ऊपर' हों, तो उन्हें अपना दबदबा जमाना है, जवाबदेही नहीं लेनी है और जो कुछ अपने लिए ले सकते हैं उसे हड़प लेना है भले ही दूसरों को कितना नुक्सान हो (आख़िरकार, आप की 'पोजीशन' आपके अपने लिए है, 'उनके' लिए नहीं). अगर ये भ्रष्टाचार नहीं तो क्या है?

शायद इसी वजह से हमारे समाज में और विशेषकर हमारी कक्षाओं में, जो बच्चा सवाल पूछता है उसे 'तंग करने वाला' समझा जाता है, उससे कहा जाता 'बहुत स्मार्ट मत बनो, नहीं तो देख लेंगे!' और यहीं आकर शिक्षा में सुधार की हमारी कोशिशें फुस्स हो जाती हैं. चूँकि नई 'सक्रिय' शिक्षण विधियाँ बच्चों के खुद से सोचने पर जोर देती हैं, और सवाल पूछने, खोज-बीन, चिंतन-विश्लेषण कर के अपने निष्कर्षों तक पहुँचने को बढ़ावा देती हैं - और इनके बारे में समझा जाता है कि ये तो हमारे समाज के आधार और कक्षाओं के परम्पराओं पर चोट पहुंचाती हैं.

अगर हमारी कक्षाएं ऐसे होती जहाँ बच्चे सवाल उठा सकते, उन्हें ये पूछने में देर नहीं लगती कि शिक्षक वे क्यों नहीं कर रहे हैं जो उन्हें करना चाहिए. वे समुदाय के साथ कई तरह के मुद्दे उठाते - सुविधाओं, स्कूल चलने के समय, प्रक्रियाओं और उनके अपने अधिकारों के बारे में... और भ्रष्ट्राचार व उसका रोल मॉडल बनाना मुश्किल हो जाता. तो हो सकता है कि आपको लगे कि मैं बेकार में ही इसे षड़यंत्र समझता हूँ, लेकिन मुझे तो लगता है कि 'शिक्षक का अनुपालन करो' भ्रष्टाचार को बनाये रखने और छोटी उम्र में बच्चों में भ्रष्ट बनने के सम्भावना को पैदा करने का हिस्सा ही है.

क्या हम अपनी कक्षाओं में बच्चों को भ्रष्ट्राचार सिखाते हैं?

देश भर में सैकड़ों, हजारों लोग भ्रष्टाचार के विरोध में उमड़ रहे हैं, अलग-अलग शहरों में घरों से बहार आ रहे हैं. और इस सब के पीछे, भ्रष्टाचार चुपके-चुपके हमारी कक्षाओं में जड़ पकड़ रहा है. देखने में यह इतना स्वाभाविक लगता है कि इसे भ्रष्ट्राचार की तरह देख पाना मुश्किल है. और यही कठिनाई भी है - हम व्यस्क लोग कई बार अपनी आखों के सामने हो रहे भ्रष्ट्राचार को भी नहीं पहचान पाते हैं क्योंकि यह वही संस्थागत आदत है जिसमें हम पले-बढ़े हैं.

कैसे होता है यह? उस बात से शुरू करिए जो सबके लिए सबसे ज्यादा मायने रखती है - परीक्षा के 'परिणाम'. ये इतने महत्वपूर्ण समझे जाते हैं की अगर हमें अछे 'मार्क' मिलें जिनके हम हक़दार नहीं हैं, तो भी ये मान्य हैं. यहाँ पर मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूँ जो नक़ल या बेईमानी करते हैं, बल्कि वे जो 'आखिरी क्षण' में पढ़ कर ठीक अंक ले आते हैं, या 'वे तीन सवाल जिनकी तैयारी की थी' पाकर अच्छा परिणाम पाते हैं. इन हालातों में, तथाकथित 'इमानदार' व 'सिंसीयर' छात्र (और उनके माता-पिता) भी वे लेने से नहीं कतराते जिसके वे हकदार नहीं हैं (और यही तो भ्रष्ट्राचार है).

परिणामों पर यह जोर हमें प्रक्रिया  को अनदेखा करने का प्रोत्साहन देता है. बच्चों को कहा जाता है कि जहाँ समझ में नहीं आ रहा है, वहां रट लें, और मेहनत कर के पढ़ने की बजाये इग्जाम गाइड का प्रयोग करें. इस हद तक होता है यह कि बच्चों को अगर सच में कुछ समझाने की कोशिश करो तो वे विरोध करते हैं, यह कहते हुए कि 'ये तो परीक्षा में आने वाला नहीं है.' छोटी उम्र में ही उन्होंने भ्रष्टाचार के बारे में एक महत्वपूर्ण सबक सीख लिया है - नतीजे की ओर देखो, प्रक्रिया को नज़रंदाज़ करो, और परीक्षा के पीछे के कारण की ही उपेक्षा करो: जो है सीखने को संभव और सुनिश्चित करना. आगे के जीवन में, भले ही ट्रेफिक के नियमों की बात हो या टैक्स देने की या सुरक्षा और कानून के नियमों की बात हो, सब को इसी तरह से नज़रंदाज़ और खोखला किया जाता है. उद्देश्य ये है की जो चाहते हो, कैसे भी पाओ, सिस्टम क्या है या क्यों बनाया गया है, ये सब जाए भाड़ में! और छोटी ही उम्र में ये सीखा जाता है हमारी कक्षाओं में.

इस पोस्ट का भाग २ मिलेगा इधर.

Sunday, 10 April 2011

प्रधान अध्यापक - क्या करे, क्या न करे?

आपकी नज़र में, वे कौन से तीन चीज़ें हैं जो प्रधान अध्यापकों को बिलकुल नहीं करनी चाहिए? और कौन सी तीन सच में करनी ही चाहिए? 

आपके जवाबों का इंतज़ार है. नीचे के कमेंट्स सेक्शन में लिखें.

(जैसा की आप समझ ही गए होंगे, प्रधान अध्यापकों के लिए प्रक्षिक्षण बनाया जा रहा है - आपके योगदान और भूमिका की सराहना की जाएगी!)

Thursday, 27 January 2011

क्या आज आपने अपने विचारों को धोया है?

टीवी के सामने कुछ मिनिट गुज़ारिए या किसी पत्रिका के पन्ने पलटिये, आप को विश्वास हो जायेगा कि अच्छा या खुबसूरत दिखना हमारे समाज में एक बहुत बड़ा लक्ष्य है! विज्ञापन पर विज्ञापन लदे हुए हैं - तरह-तरह की क्रीमों, फेस वॉश, शेम्पू, रेज़रों, गहनों, कपड़ों के - सब बताते हुए कि अब हम 'दिखना' युग में पहुँच चुके हैं. अगर आप वैसे 'दिखते' नहीं, तो जैसे आप हैं ही नहीं!

पर जैसे-जैसे हम अपने शरीरों को सवांरते हैं, अच्छा होगा अगर हम अपने मन को भी सवांरें. ऐसा नहीं कर पाने की वजह से ही हमारी बहुत सारी मुश्किलें पैदा हुई हैं या चलती जा रहीं हैं. उदहारण के लिए देखें हमारी शिक्षा व्यवस्था को, जिसमें ५७ लाख शिक्षक और करीब ३ लाख अधिकारी अलग-अलग स्तर पर हैं. अब अपने लुढ़कते-पुढ़कते ढंग से व्यवस्था चलती तो जा रही है, लेकिन इसके सामने भी यही समस्या है. हमारे चिंतन की धार इतनी कम हो चुकी है या कौशल इतने सीमित हो चुके हैं कि परिवर्तन के हरेक चरण पर बहुत बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.
  • शिक्षा से जुड़ा हरेक व्यक्ति (stakeholder) किस तरह चाहे गए बदलाव के कल्पना करे, या कैसे खुद अपना vision बनाये?
  • ऊपर से नीचे जितने लोग जुड़े हैं, वे कैसे इतने व्यापक और विशाल परिवर्तन की संकल्पना करें, उसे समझने की शुरुआत करें?
  • चूंकि परिवर्तन के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करना ज़रूरी है, कैसे हर व्यक्ति की मदद करें कि वह बेहतर योजना बना सके - अर्थात, चाहे गए लक्ष्य को पहचान सके, वर्तमान स्तिथि उनसे कितनी दूर है (या गेप्स क्या हैं) समझ सके, संभव 'हल' ढूंढ सके, अलग-अलग विकल्पों के बीच चुन सके कि कौन से सबसे उपयुक्त हैं, और क्रम और प्राथमिकता में अंतर पकड़ सके!
और अभी तो हम असली क्रियान्वयन पर पर पहुंचे भी नहीं. अमल करने वाले चरण पर तो कई सारे काम शामिल हैं, जैसे - पढाना और उसके लिए विभिन तरीकों का प्रयोग करना, मेंटरिंग करना, सम्प्रेषण, सुपरविज़न, प्रबंधन और संयोजन, मोनिटरिंग, काउंसेलिंग, आकलन और मूल्यांकन. ये सारे वे काम हैं जिनमें विभिन्न प्रकार के चिंतन कौशलों की ज़रूरत होती है. पहले-पहले तो ये जान कर ही झटका लगता है कि इनके लिए अलग-अलग तरह के सोचने के तरीके या अलग-अलग तरह के चिंतन-औजारों की ज़रूरत पड़ती है. याने, किसे भी काम को करने के पहले यह सोचना ज़रूरी है कि - यहाँ पर सोचने का सबसे अच्छा तरीका क्या होगा? कुछ उसी तरह जैसे कोई सर्जन किसी जटिल ऑपरेशन के हरेक चरण पर अलग-अलग औजारों का प्रयोग करता है.

इस स्तिथि से उभरने के लिए हम क्या कर सकते हैं? कुछ शुरुआती सुझाव:
  • जो भी प्रमुख क्रियाएँ / कार्य आप करतें हैं, उनकी सूची बनाएं
  • अब पहचानें कि इनमें आप कौन-कौन से चिंतन कौशलों या सोचने के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं (जैसे, क्या आप को अधिक सृजनात्मक होने की ज़रूरत पड़ती है, या आप को उपलब्ध जानकारी से बंध कर ही तार्किक नतीजों तक पहुंचना होता है?)
  • इन चिंतन कौशलों का अभ्यास करें
  • नए कदमों या एक्शन लेने के पहले, उपयुक्त चिंतन औजार / तरीके को चुनें
  • और अंत में, समय-समय पर अपने विचारों को धोना ना भूलें! याने, ये ज़रूर सोचें कि कहीं रोज़मर्रा के कामों में उपयोग किये जाने वाले विचार कहीं बासी तो नहीं हो गए हैं? या धूल से ढक तो नहीं गए हैं, या ज्यादा ही पुराने तो नहीं हो गए हैं? उन्हें त्याग कर नए विचारों को अपनाने की ज़रूरत तो नहीं है?
उम्मीद है कि 'दिखना' युग में भागीदार बनाने के साथ-साथ हम में से कम से कम कुछ लोग तो 'सोचना' युग की रचना ज़रूर करेंगे!

Wednesday, 26 January 2011

सभी शिक्षण-विधियों के 'दिल' मे

पिछले दो दशकों में तो शिक्षण-विधियों में जैसे विस्फोट-सा हुआ है. सरकारी संस्थाएं, अकादमिक संस्थाएं, गैर-सरकारी संस्थाएं और अब तो IT कंपिनयां और कॉर्पोरेट इंडस्ट्री द्वारा स्थापित गैर-सरकारी संस्थाएं भी सब पढ़ाने के अपने-अपने 'अचूक' नुस्खे दर्ज कर चुकी हैं. कक्षा की प्रक्रिया को 'रुचिकर' बनाया जायेगा, 'आनंददायी' गतिविधियाँ की जाएँगी, टी एल एम् और 'सीखने की सीढ़ियाँ' उपयोग में ली जाएँगी, वगैरह.

लेकिन इन सब की तह में जाएँ, तो हमें मिलेगा यह मूल सिद्धांत - अगर शिक्षक को सच में अपने बच्चों की परवाह है, तो वह रास्ता ढूंड लेगा. इन सारी शिक्षण विधियों का मतलब तब ही है जब शिक्षक को अपने बच्चों में रूचि हो और उन्हें सीखने में मदद कर के उसे आनंद आता हो. देखा जाए तो हमारे अधिकाँश प्रशिक्षण कार्यक्रम, सामग्री और शिक्षण-विधियों का दावा होता है कि वे शिक्षक को अधिक प्रभावशाली बना देंगे. लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि वे उन में बच्चों की ओर वह भावनात्मक प्रतिबद्धता पैदा करेंगी जो सफल कक्षा-प्रक्रियाओं की नीव होती है.

कैसे हो सकता है यह? जब तक शिक्षकों को खुद ही अपने 'शिक्षकों का प्रेम' पाने का अवसर नहीं मिला हो, वे अपने बच्चों को भी यह अनुभव नहीं दे सकते हैं. अधिकांश प्रशिक्षण कार्यक्रमों में,  इस भावनात्मक पहलू पर कम ही ध्यान दिया जाता है. यहाँ तक कि उन में भी जो शिक्षकों से अपेक्षाओं को स्वयं ठोस रूप से मॉडल करने की कोशिश करते हैं.

हाल के कार्यक्रमों में भाग लेने वाले शिक्षकों ने अपने बचपन में ऐसे ही शिक्षकों को देखा जिन्हें अपने बच्चों की विशेष परवाह नहीं थी. कुछ को तो यह भी लगता है कि अगर उनके शिक्षकों नें उनकी ओर सच में ध्यान दिया होता तो वे शिक्षक ना हो के कुछ और (बेहतर) काम कर रहे होते! इसके चलते, प्रशिक्षण के दौरान वे पाते हैं कि प्रशिक्षक को उनसे 'ऊपर' का दर्ज़ा दिया गया है, और कई बार तो भिड़ंत वाली स्तिथि रहती है. सेवा-कालीन प्रशिक्षण में तो यह और भी चुभने वाली बात बन जाती है, क्योंकि प्रशिक्षण से उनकी योग्यता या सर्विस कंडीशंस पर कोई असर नहीं पड़ता - और वे कई बार प्रशिक्षक की 'परीक्षा' लेते नज़र आते हैं, या ऊपर से हाँ कर के बाद में कक्षा में कुछ भी नहीं करते!

इसलिए बेहद ज़रूरी है कि ऐसी प्रशिक्षण प्रक्रिया हो जो सच में शिक्षकों को जोड़े, जहाँ उन्हें खुल कर अपनी बात कहने के मौके हों, वे अपने तर्क दे सकें और उन्हें गंभीरता से लिया जाये, जहाँ प्रशिक्षक उन्हें बुद्धि रखने वाले इंसान का दर्ज़ा दे. इस तरह की प्रशिक्षण प्रक्रिया शिक्षकों को एक ख़ास तरह की 'सफलता' का अनुभव देगी - अपनी खुद की समझ को रचने, अभिव्यक्त करने और प्रदर्शित करने की. और ये ही उन्हें सीखने-सिखाने की अद्भुत प्रक्रिया की ओर खींचेगी. ये वह ही अपनत्व का भाव या 'प्रेम' है जिसका अनुभव शिक्षकों ने अपने जीवन में पहले नहीं किया. अगर इस तरह से हम उनका दिल छू सकते हैं, तो शायद 'शिक्षण-विधि' की चिंता करने की ज़रूरत ही नहीं!


Sunday, 23 January 2011

बुद्धिजीवी या बुद्धूजीवी ?

कहीं ना कहीं आप का पाला इनसे ज़रूर पड़ा होगा - अपने आप को गहरा और दूसरों से 'हट के' ज्ञानी समझने वाले लोग. इनकी हरेक बात में 'कुछ' होता है - अब क्या होता है यह तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन कम से कम उन्हें तो लगता ही है कि 'कुछ' है. दुर्भाग्य से शिक्षा और विकास के क्षेत्र में तो अपने आप को 'अलग' दिखाते हुए ये दीखते ही रहते हैं. कभी उनके कपड़ों या बालों से यह झलकता है, कभी उनके चलने के 'विचारमय' ढंग से, और कहीं उनके बात रखने के अंदाज़ से.


     जैसे, चर्चा चल रही है कि 'आखिर करना  क्या है?' तो ये बोल उठेंगे: 'देखिये, इस मुद्दे पर आने के पहले, ये समझना बहुत ज़रूरी है कि....' - और फिर एक लम्बी भूमिका हो जायेगी शुरू. जब आप याद दिलाएंगे कि भई बात करनी है कि करना क्या है, तो थोड़ा सिर हिला के मुद्दे पर आएँगे और कहेंगे: 'जहाँ तक सवाल उठता है कि कौन से कदम उठाये जाएँ... ये तो हमें समझना ही होगी कि क्यों ज़रूरी है कि हम इस पर एक्शन लें...' और फिर इससे पहले कि आप उन्हें रोक पाएं, कुछ करने की आवश्यकता पर लम्बी टिप्पणी हो जाती है शुरू. 
    'भाई साहब, कुछ करना ज़रूरी है, इसीलिए तो बात कर रहें हैं कि करना क्या है! कदम भी तो सुझाएँ.'
    'देखिये, मैं नहीं मानता कि हमें आप को बस सीधे-सीधे बता देना चाहिए. कम से कम आप अपनी ओर से सोचें तो सही, उसके बाद ही हम जैसे लोगों कि सलाह लें.'
    'भैया बहुत सोचने के बाद ही तो हम आप से पूछ रहें हैं...'
    'अच्छा, ऐसा है तो सुनिए. पहले तो आप को प्रतिबद्धता से काम करना पड़ेगा. फिर, समस्या का गहराई से अध्ययन करें, संभावनाएं  खोजें, और उनमें से चुन कर हल निकालें.'
    'भायाराम, इतना तो हम भी सोच लिए थे, लेकिन करना  क्या है ये तो अभी भी नहीं पता लगा!


अब:

  • सामान्य सवाल: ये बताइए, ऊपर में से एक ना एक तो बुद्धूजीवी ज़रूर है  - कौन सा, पता कर सकते हैं? और क्यों उसे आप ये दर्ज़ा देना चाहते हैं?
  • थोड़ा डरावना सवाल: क्या आप ने इन में से किसी को अपने आस पास तो नहीं देखा है?
  • खतरनाक सवाल: अगर आप अपने आप में ही ये बुद्धूजीवी वाले गुण पा रहें हों, तो क्या करेंगे?

अपने विचार लिखना ना भूलें!